भारत बनाम आतंकवाद: एक दशक में एक तिहाई हुए आतंकी हमले, कश्मीर घाटी अब भी चुनौतीपूर्ण

देशभर में आतंकवाद पर सख्त नियंत्रण

भारत ने बीते दस वर्षों में आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी है। केंद्र सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति, तकनीकी सशक्तिकरण और सुरक्षाबलों की तत्परता के चलते आतंकी घटनाओं में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि जहां 2004 से 2014 के बीच देश में 7,217 आतंकी वारदातें हुई थीं, वहीं 2014 से 2024 के बीच इनकी संख्या घटकर 2,242 रह गई।

यह कमी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि आम जनजीवन में सुरक्षा की भावना भी बढ़ी है। देश के अधिकतर हिस्सों में अब आतंकी घटनाएं अपवाद बन चुकी हैं।

कश्मीर घाटी: अब भी संघर्ष जारी

हालांकि, कश्मीर घाटी अब भी आतंकवाद की बड़ी चुनौती बनी हुई है। दक्षिण एशिया आतंकवाद पोर्टल (SATP) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2000 से 2024 तक देश में कुल 72,427 आतंकी हमलों में से हर तीसरा हमला जम्मू-कश्मीर में हुआ। इन 22,143 हमलों में 4,981 आम नागरिक और 3,624 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए।

कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियों का ग्राफ लगातार उतार-चढ़ाव का सामना कर रहा है। वर्ष 2014 में 240 हमले हुए थे, जो 2022 में बढ़कर 457 तक पहुंच गए। हालांकि इसके बाद गिरावट आई और 2023 व 2024 में यह संख्या घटकर क्रमशः 267 और 210 रही।

सुरक्षाबलों का पराक्रम और चुनौतियां

इन वर्षों में सुरक्षाबलों ने 24,512 आतंकियों को मार गिराया, जिनमें से लगभग आधे जम्मू-कश्मीर में ढेर किए गए। इससे यह स्पष्ट होता है कि कश्मीर घाटी में आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध अब भी जारी है।

इंस्टिट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट (ICM) का कहना है कि आतंकी अब सीधे संघर्ष से बचते हुए बड़ी घटनाओं की योजना बना रहे हैं। सुरक्षाबलों की चुनौतियां भी इसी कारण बदल रही हैं – अब सतर्कता और खुफिया सूचना तंत्र पर अधिक निर्भरता है।

आत्मसमर्पण की संख्या में गिरावट

एक और गंभीर पहलू है कि कश्मीर में आतंकियों के आत्मसमर्पण की संख्या में कमी आई है। 2000 से 2024 के बीच कुल 847 आतंकियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें अधिकतर ने मुठभेड़ के दौरान परिजनों की अपील पर हथियार छोड़े। लेकिन 2011 के बाद इस प्रवृत्ति में गिरावट आई है। आखिरी बार जुलाई 2022 में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े दो आतंकियों ने कुलगाम जिले में आत्मसमर्पण किया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि अब आतंकी संगठन स्थानीय समर्थन खोते जा रहे हैं। इसका एक दुष्प्रभाव यह है कि जब आतंकी अकेले पड़ते हैं, तो आत्मसमर्पण करने की बजाय आखिरी दम तक लड़ने की मानसिकता अपनाते हैं।

पत्थरबाजी पर पूरी तरह विराम

कश्मीर घाटी में एक बड़ा बदलाव पत्थरबाजी की घटनाओं में देखने को मिला है। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से 2014 के बीच हर साल औसतन 2,654 संगठित पत्थरबाजी की घटनाएं होती थीं। 2024 में ऐसी कोई भी घटना दर्ज नहीं की गई है। यह दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर अब कट्टरपंथ के लिए जमीन पहले जैसी नहीं रही।

सुरक्षा विशेषज्ञ इसे एक सकारात्मक संकेत मानते हैं। पहले जो युवा पत्थरबाजों के रूप में सामने आते थे, वे अब धीरे-धीरे मुख्यधारा में लौट रहे हैं।

जनहानि में भारी कमी

गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2024 के बीच आतंकी हमलों में नागरिकों की मौतों में 81% और सुरक्षाकर्मियों की मौतों में 50% तक की कमी आई है। यह न सिर्फ सुरक्षाबलों की रणनीतिक सफलता है, बल्कि सरकार की नीतियों की मजबूती को भी दर्शाता है।

स्थानीय समर्थन में गिरावट

ICM के अनुसार, अब आतंकियों को स्थानीय मदद मिलना कम हो गया है। एक ओर सोशल मीडिया के जरिये आतंकी युवाओं को बहकाने की कोशिश करते हैं, लेकिन दूसरी ओर सुरक्षा एजेंसियां भी डिजिटल निगरानी से उन प्रयासों को विफल कर रही हैं। इसका असर ये है कि अब स्थानीय स्तर पर आतंकी गतिविधियों की नींव कमजोर होती जा रही है।

फॉरवर्ड थिंकिंग और समावेशी विकास की आवश्यकता

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सैन्य सफलता से ही आतंकवाद का अंत नहीं होगा। घाटी में समावेशी विकास, रोजगार, शिक्षा और संवाद की प्रक्रिया को भी मजबूत करना होगा। युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए लंबे समय तक चलने वाली योजनाओं की आवश्यकता

भारत ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। एक दशक में आतंकी हमलों की संख्या एक तिहाई तक सिमट जाना इस बात का प्रमाण है कि देश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि कश्मीर घाटी अब भी आतंकवाद की चुनौती से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी है, लेकिन वहां भी धीरे-धीरे बदलाव की बयार महसूस हो रही है।

आतंकवाद के विरुद्ध यह लड़ाई अब सिर्फ बंदूक की नहीं, बल्कि नीति, संवेदनशीलता और विकास की होनी चाहिए – तभी भारत एक स्थायी रूप से सुरक्षित राष्ट्र बन सकेगा।

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