नई दिल्ली | अमर उजाला संवाददाता
केंद्र की मोदी सरकार ने 30 अप्रैल 2025 को ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए आगामी जनगणना के साथ जातीय आधार पर भी गणना कराने की घोषणा की है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। इस निर्णय के दूरगामी सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ने की संभावना है।
जातीय गणना से आरक्षण सीमा पर होगा असर
अब तक देश में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय की गई है, जिसे 1992 में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने इंदिरा साहनी मामले में निर्धारित किया था। कोर्ट ने कहा था कि इससे अधिक आरक्षण संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा। लेकिन जातीय आंकड़े आने के बाद ओबीसी वर्ग जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की मांग कर सकता है। इसका मतलब यह हो सकता है कि 50 फीसदी की सीमा को तोड़ा जाए और आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाए।
राजनीतिक समीकरणों में बदलाव तय
जाति गणना का असर संसद और राज्य विधानसभाओं पर भी दिखेगा। आंकड़ों के आने के बाद जिन जातियों की संख्या अधिक होगी, वे राजनीतिक रूप से गोलबंद होंगी। ऐसे में राजनीतिक दल उन्हें अधिक प्रतिनिधित्व देने की कोशिश करेंगे। यह स्थिति पहले भी मंडल आयोग के लागू होने के समय देखी गई थी, जब उत्तर प्रदेश और बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दलों — जैसे समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल — का उदय हुआ था।
कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी ने भी अब इसी रणनीति को अपनाना शुरू कर दिया है। कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस सरकारों ने जातीय सर्वेक्षण पहले ही कराए हैं।
किस जाति की कितनी जनसंख्या, अब आएगा स्पष्ट आंकड़ा
1931 के बाद भारत में जाति आधारित जनगणना नहीं हुई है। उस समय ओबीसी की जनसंख्या 52 फीसदी बताई गई थी, जो आज भी कई विश्लेषकों द्वारा मान्य है। बिहार के हालिया जातीय सर्वेक्षण में ओबीसी (पिछड़ा वर्ग + अति पिछड़ा वर्ग) की कुल आबादी 63.13% पाई गई।
अब केंद्र द्वारा जातीय जनगणना कराने के बाद देशव्यापी आंकड़ा सामने आएगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि किस जाति की वास्तविक जनसंख्या कितनी है, और इसके आधार पर वह वर्ग अपने संवैधानिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व के लिए मांग कर सकेगा।
शिक्षा और नौकरियों में भी असर
अगर आरक्षण की सीमा बढ़ती है तो सरकारी स्कूल-कॉलेजों और नौकरियों में इसका प्रभाव व्यापक होगा। पिछड़ी जातियों के छात्र-छात्राएं शिक्षा में ज्यादा जगह बना सकते हैं और सरकारी नौकरियों में उनकी भागीदारी भी बढ़ सकती है। इससे सामाजिक संतुलन के नए मानक स्थापित हो सकते हैं, लेकिन साथ ही प्रतिस्पर्धा और अवसरों में टकराव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।
समाज में बढ़ सकता है जातिगत तनाव
जहां जातीय जनगणना से सामाजिक न्याय की नई दिशा मिलने की उम्मीद है, वहीं सामाजिक मतभेद और विभाजन की आशंका भी जताई जा रही है। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के समय देश में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। आत्मदाह, हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं आम थीं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी यह अंदेशा बना हुआ है कि यदि एक जाति को उसके आंकड़ों के अनुसार लाभ मिलेगा तो अन्य जातियां असंतोष प्रकट कर सकती हैं। इससे समाज में तनाव और ध्रुवीकरण की स्थिति जन्म ले सकती है।
राजनीतिक दल उठा सकते हैं लाभ या नुकसान
जातीय आंकड़ों के आधार पर राजनीतिक दल अपने वोट बैंक को फिर से संगठित कर सकते हैं। कुछ दल इससे सीधा लाभ उठा सकते हैं, जबकि कुछ का जनाधार कमजोर पड़ सकता है। खासकर भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आरजेडी जैसे दलों की नीतियों और रणनीतियों में बड़ा फेरबदल आ सकता है।
क्या कहती है सरकार?
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि यह कदम समाज में किसी तरह का विघटन नहीं करेगा, बल्कि इससे नीतिगत योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी। उन्होंने दावा किया कि इससे देश की एकता पर कोई खतरा नहीं होगा, बल्कि लक्षित वर्गों को सटीक लाभ मिल सकेगा।
जातीय गणना का फैसला ऐतिहासिक है, लेकिन इसका क्रियान्वयन संवेदनशीलता और सावधानी से करना होगा। इससे सामाजिक न्याय के दरवाजे खुल सकते हैं, परंतु साथ ही यह नवीन सामाजिक दरारों को जन्म भी दे सकता है। यह देखना अब अहम होगा कि मोदी सरकार गणना के बाद के आंकड़ों को कैसे प्रबंधित करती है और किस तरह नीतियों में समावेश करती है

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